वन विभाग का ‘कागजी’ खेल: 3 साल में फूंके ₹1.92 करोड़, जमीन पर सिर्फ सन्नाटा!
रामनगर रेंज में 'हरियाली' के नाम पर महाघोटाला; पर्यावरण मंत्री तक पहुंची शिकायत, महकमे में हड़कंप।
कागजी जंगलों से करोड़ों डकार गया रामनगर रेंज: ‘हरे’ घोटाले से ‘लाल’ हुई वन विभाग की साख!
विशेष ब्यूरो, बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
- फाइलें हुईं ‘हरी-भरी’, पौधे डकार गए रेंजर साहब! हर साल एक ही जमीन पर कागजी वृक्षारोपण, RTI के नाम पर वन विभाग को आता है चक्कर।
- बस्ती में ‘जीरो टॉलरेंस’ को दीमक की तरह चाट रहा वन विभाग! 7.70 हजार पौधों का कोई अता-पता नहीं; बिना भौतिक सत्यापन के ठेकेदारों को लुटाया सरकारी धन।
- ‘ऑनलाइन ढूंढ लो सच’— RTI से घबराए रामनगर रेंजर ने खड़े किए हाथ! बिल-वाउचर छिपाने के लिए डिजिटल बहानेबाजी; घिरे अफसरों के कांप रहे हाथ।
बस्ती। उत्तर प्रदेश को हरा-भरा बनाने के सरकारी दावों को बस्ती मंडल का वन विभाग किस तरह ‘दीमक’ की तरह चाट रहा है, इसका एक और सनसनीखेज प्रमाण सामने आया है। रामनगर रेंज में वृक्षारोपण के नाम पर करोड़ों रुपये का ऐसा ‘कागजी जंगल’ उगाया गया है, जिसका जमीनी हकीकत से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। आरोप इतने गंभीर हैं कि हर साल एक ही जमीन पर हजारों पौधे लगाने का दावा ठोक कर सरकारी धन को बेरहमी से ठिकाने लगा दिया गया। जब भ्रष्टाचार की इस ‘हरियाली’ की जांच धरातल पर की गई, तो वहां सिर्फ खाली मैदान और सन्नाटा पसरा मिला!
राष्ट्रीय पत्रकार एकता संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं प्रेस क्लब उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष राहुल सिंह ने इस महाघोटाले की कलई खोलते हुए सीधे सूबे के पर्यावरण मंत्री डॉ. अरुण सक्सेना से शिकायत की है। इस शिकायत के बाद से ही पूरे बस्ती मंडल में हड़कंप मचा हुआ है और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।
- शिकायती पत्र में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। वन विभाग के अधिकारियों ने कागजों पर पैसों की जो ‘बारिश’ की है, उसे देखिए:
वित्तीय वर्ष 2023-24: वृक्षारोपण के नाम पर लगभग 80 लाख रुपये फूंक दिए गए।
वित्तीय वर्ष 2024-25: करीब 30 लाख रुपये का खर्च दिखाया गया।
वित्तीय वर्ष 2025-26: रिकॉर्ड तोड़ 82 लाख रुपये से अधिक की धनराशि विभागीय फाइलों में ‘रोप’ दी गई।
इतना ही नहीं, कागजों में यह भी दर्ज है कि पिछले दो वर्षों में करीब 7.70 हजार पौधे लगाए गए हैं। इनमें शीशम, सागौन, सहजन, अकाशिया और यूकेलिप्टस जैसे बेशकीमती पौधों की लंबी-चौड़ी खेप शामिल थी। लेकिन सवाल यह है कि ये हजारों पौधे आखिर गए कहां? क्या इन्हें जमीन निगल गई या वन विभाग के रेंजर और अधिकारी डकार गए?
कड़वा सवाल: सड़क किनारे, वन भूमि और ग्राम समाज की खाली जमीनों पर हर साल कागजों में पौधे उगते हैं, बजट पास होता है और अगली बरसात से पहले वे गायब हो जाते हैं। क्या यह बिना भौतिक सत्यापन के सरकारी धन के खुलेआम दुरुपयोग का नंगा नाच नहीं है?
RTI से डरता है विभाग, बहानेबाजी का ‘डिजिटल’ खेल
इस पूरे खेल में सबसे शर्मनाक रवैया सूचना के अधिकार (RTI) को लेकर अपनाया गया। जब शिकायतकर्ता राहुल सिंह ने जनसूचना के तहत वृक्षारोपण से संबंधित बिल-वाउचर और भुगतान के दस्तावेज मांगे, तो विभाग बगलें झांकने लगा। आरटीआई के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए विभाग ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि ‘अभिलेख ऑनलाइन अपलोड हैं, वहीं से निकाल लो!’
यह जवाब सीधे तौर पर सच को छुपाने और भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की घटिया कोशिश है। अगर कुछ छुपाने को नहीं था, तो बिल-वाउचर सार्वजनिक करने में रेंजर रामनगर के हाथ क्यों कांप रहे थे?
उच्चस्तरीय जांच और कार्रवाई की मांग
इस मामले के उजागर होने के बाद बस्ती मंडल की जनता में भारी आक्रोश है। शिकायतकर्ता ने पर्यावरण मंत्री से मांग की है कि इस पूरे महाघोटाले की एक निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। बिना भौतिक सत्यापन के भुगतान करने वाले दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कठोर वैधानिक व दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।
अब देखना यह है कि योगी सरकार का ‘भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस’ का चाबुक इन ‘कागजी वन अधिकारियों’ पर कितनी जल्दी चलता है, या फिर फाइलों का यह हरा-भरा जंगल इसी तरह सरकारी खजाने को चूना लगाता रहेगा!










